Home Hindi विजयादशमी उत्सव नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत...

विजयादशमी उत्सव नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के उद्बोधन का सारांश….

0
SHARE

प्रास्ताविक

इस वर्ष की विजयादशमी के पावन अवसर को संपन्न करने के लिये हम सब आज यहाँ पर एकत्रित है. यह वर्ष श्रीगुरुनानक देव जी के प्रकाश का 550वाँ वर्ष है. अपने भारतवर्ष की प्राचीन परम्परा से प्राप्त सत्य को भूलकर, आत्मविस्मृत होकर जब अपना सारा समाज दम्भ, मिथ्याचार, स्वार्थ तथा भेद की दलदल में आकण्ठ फँस गया था और दुर्बल, पराजित व विघटित होकर लगातार सीमा पार से आने वाले क्रूर विदेशी असहिष्णु आक्रामकों की बर्बर प्रताड़नाओं को झेलकर तार-तार हो रहा था, तब श्रीगुरुनानक देव जी ने अपने जीवन की ज्योति जलाकर समाज को अध्यात्म के युगानुकूल आचरण से आत्मोद्धार का नया मार्ग दिखाया, भटकी हुई परम्परा का शोधन कर समाज को एकात्मता व नवचैतन्य का संजीवन दिया. उन्हीं की परम्परा ने हमको देश की दीन-हीन अवस्था को दूर करने वाले दस गुरुओं की सुन्दर व तेजस्वी मालिका दी.

उसी सत्य व प्रेम पर स्थापित सर्वसमावेशी संस्कृति के, देश में विभिन्न महापुरुषों के द्वारा समय-समय पर पुरस्कृत व प्रवर्तित, देश काल परिस्थिति के अनुरूप प्रबोधन के सातत्य का परिणाम है कि जिनके जन्म का यह 150वाँ वर्ष है ऐसे महात्मा गाँधी जी ने इस देश के स्वतंत्रता आन्दोलन को सत्य व अहिंसा पर आधारित राजनीतिक अधिष्ठान पर खड़ा किया. ऐसे सभी प्रयासों के कारण देश की सामान्य जनता स्वराज्य के लिए घर के बाहर आकर, मुखर होकर अंग्रेजी दमनचक्र के आगे नैतिक बल लेकर खड़ी हो गयी. एक सौ वर्ष पहले अमृतसर के जलियाँवाला बाग में स्वराज्य के लिये तथा ”रौलेट कानून“ के अन्याय व दमन के विरुद्ध संकल्पबद्ध, चारों ओर से घेरकर जनरल डायर के नेतृत्व में जिन्हें गोलीबारी का शिकार बनाया गया, उन हमारे सैकड़ों निहत्थे देशबांधवों के त्याग, बलिदान व समर्पण का स्मरण भी इस नैतिक बल को हम में जागृत करता है.

इस वर्ष के इन औचित्यपूर्ण संस्मरणों का उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि स्वतंत्रता के 71 वर्षों में हमारे देश ने उन्नति के कई आयामों में एक अच्छा स्तर प्राप्त कर लिया है, परन्तु सर्वांगपरिपूर्ण राष्ट्रीय जीवन के और भी कई आयामों में अभी हमें बढ़ना है. हमारे देश के विश्व में सुसंगठित, समर्थ व वैभव-सम्पन्न बन कर आगे आने से जिन शक्तियों के स्वार्थ-साधन का खेल समाप्त या अवरुद्ध हो जाता है, वे शक्तियाँ तरह-तरह के कुचक्र चलाकर देश की राह में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आयी हैं. कई चुनौतियों को हमें अभी पार करना है. हमारे पूर्वज महापुरुषों द्वारा स्वयं के जीवन के उदाहरण से, उपदेश से जो सत्यनिष्ठा, प्रेम, त्याग, पवित्रता व तपस् के आदर्श समाज में स्थापित व आचरण में प्रवर्तित किये गये, उन्हीं पर चलकर हम इस कार्य को कर सकेंगे. देश के परिदृश्य पर थोड़ा गौर करने पर वहाँ चले हुए धूप-छाँव के खेल में यही बोध दृष्टिगत होता है.

देश की सुरक्षा

किसी भी देश के लिए उस देश की सीमाओं की सुरक्षा तथा अंतर्गत सुरक्षा की स्थिति विचार का विषय पहला रहता है क्योंकि इनके ठीक रहने से ही देश की समृद्धि व विकास के लिए प्रयास करने हेतु अवकाश व अवसर उपलब्ध होते हैं. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के तानों-बानों को ठीक से समझकर अपने देश की सुरक्षा-चिन्ताओं से उनको अवगत कराना व उनका सहयोग समर्थन प्राप्त करना यह भी सफल प्रयास हुआ है. पड़ोसी देशों सहित सब देशों से शांतिपूर्ण व सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाने बढ़ाने की अपनी इच्छा, वाणी व कृति को कायम रखते हुए, देश के सुरक्षा संदर्भ में जहाँ आवश्यक वहाँ दृढ़ता से खड़े व अड़े रहना तथा साहसपूर्ण पहल करके अपने सामथ्र्य का विवेकी उपयोग करना यह भी अपना रुख सेना, शासन व प्रशासन ने स्पष्ट दिखाया है. इस दृष्टि से अपनी सेना तथा रक्षक बलों का नीति धैर्य बढ़ाना, उनको साधन-सम्पन्न बनाना, नयी तकनीक उपलब्ध कराना आदि बातों का प्रारम्भ होकर उनकी गति बढ़ रही है. दुनिया के देशों में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ने का यह भी एक कारण है.

साथ-साथ ही सुरक्षा बलों, रक्षक बलों तथा उनके परिवारों के योगक्षेम की व्यवस्था पर ध्यान बढ़ाना आवश्यक है. इस दिशा में कुछ अच्छे प्रयास शासन के द्वारा हुए हैं. उन को लागू करने की गति कैसे बढ़ सकती है इस पर विचार करना आवश्यक है. सैनिक अधिकारी व नागरिक प्रशासकीय अधिकारी, गृहमंत्रालय, सुरक्षा मंत्रालय, अर्थ मंत्रालय आदि अनेक विभागों में से इन योजनाओं का विचार व अमल होना प्रषासकीय दृष्टि से अनिवार्य है. इन बलों के कार्य का तथा उस कार्य के लिए प्राणों तक की बाजी लगा देने की तैयारी का इन विभागों के सब व्यक्तियों के मन में समान सम्मान व संवेदना रहे यह स्वाभाविक अपेक्षा चर्चा में सुनाई देती है. यह अपेक्षा जितनी शासन से व प्रशासन से है उतनी ही समाज से भी है, यह प्रत्येक देशवासी को ध्यान में रखना चाहिए. सीमा पार तथा आवश्यकतानुसार देश के अंदर भी समाज की सुरक्षा के लिए जूझनेवाले अपने बंधु अपने परिवार की सुव्यवस्था व सुरक्षा के बारे में निश्चिन्त होकर अपना काम कर सकें यह आवश्यक है. अभी पश्चिम सीमापार के देश में हुए सत्तापरिवर्तन से हमारे सीमा पर तथा पंजाब, जम्मू व कश्मीर जैसे राज्यों में चली उसकी प्रकट अथवा छुपी उकसाऊ गतिविधियों में कोई कमी आने की न अपेक्षा थी, न वैसा हुआ है.

अंतर्राष्ट्रीय घटनाचक्र के परिप्रेक्ष्य में सागरी सीमा की सुरक्षा एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय बना है. मुख्यभूमि से लगे सागरी क्षेत्र में कम अधिक दूरी पर भारत में अंतर्भूत सैकड़ों द्वीप हैं. अन्दमान निकोबार द्वीप समूह सहित ये सभी द्वीप सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थानों पर स्थित हैं. उनकी निगरानी व्यवस्था तथा सुरक्षा की दृष्टि से वहाँ की व्यवस्था का सबलीकरण यह अतिशीघ्रता से ध्यान देकर पूर्ण करने का विषय है. सागरी सीमा व द्वीपों पर ध्यान देनेवाली नौसेना तथा अन्य बल इन में आपसी तालमेल, सहयोग व साधनसंपन्नता पर शीघ्र अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है. भू तथा सागरी सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वाले अपने बंधु कई सीमाविशिष्ट परिस्थितियों का सामना करते हुए भी धैर्यपूर्वक डटे रहते आये हैं. उनकी वहाँ व्यवस्था ठीक रहे तो आतंकी घुसपैठ, तस्करी आदि समस्याओं को कम करने में वे सहायक भी हो सकते हैं. उनको समय-समय पर उचित राहत मिले, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की व्यवस्था उन तक पहुँचती रहे तथा उनमें साहस, संस्कार व देशभक्ति की उत्कटता बनी रहे, इसके लिए शासन व समाज दोनों के प्रयास अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है.

सुरक्षा उत्पादों के मामले में देश की संपूर्ण आत्मनिर्भरता को – अन्य देशों के साथ आपसी आदान-प्रदान की उचित मात्रा रखते हुए भी – साधे बिना हम देश की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकते. इस दिशा में देश में प्रयासों की गति बहुत अधिक होनी पड़ेगी.

आन्तरिक सुरक्षा

देश की सीमाओं की सुरक्षा के साथ ही देश में अंतर्गत सुरक्षा का विषय भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है. उसके उपायों का एक पहलू केन्द्र व राज्य शासनों तथा प्रशासन के द्वारा कड़ाई के साथ कानून, संविधान तथा देश की सार्वभौम संप्रभुता को चुनौती देने वाली, हिंसक गतिविधियाँ करने वाली, देश के अन्दर तथा बाहर से प्रेरित अथवा प्रेषित मंडलियों का बंदोबस्त करना है. इसमें केन्द्र व राज्य सरकारों की तथा पुलिस व अर्धसैनिक बलों की कार्यवाई सफलतापूर्वक चली है. निरन्तर सजगता के साथ उन्हें उसको जारी रखना पड़ेगा. परन्तु ऐसी हिंसक तथा सीधे तौर पर गैरकानूनी गतिविधियों में भाग लेनेवाले लोग अपने ही समाज में से मिल जाते हैं यह वस्तुस्थिति है. उसके मूल में अपने समाज में व्याप्त अज्ञान, विकास तथा सुविधाओं का अभाव, बेरोजगारी, अन्याय, शोषण, विषमता का व्यवहार तथा स्वतंत्र देश में आवश्यक विवेक व संवेदना का समाज बड़ी मात्रा में अभाव है. उसे दूर करने में शासन-प्रशासन की भूमिका अवश्य है. परन्तु उससे बड़ी समाज की भूमिका है. समाज में इन सब त्रुटियों को दूर कर उसके शिकार हुए समाज के अपने इन बंधुओं को स्नेह व सम्मान से गले लगाकर समाज में सद्भावपूर्ण व आत्मीय व्यवहार का प्रचलन बढ़ाना पड़ेगा. समाजजीवन के इस परिष्कार का प्रारम्भ पहले स्वयं के मन मस्तिष्क के परिष्कार तथा अपने आचरण से करना होगा. समाज के सब प्रकार के वर्गों से आत्मीय व नित्य संपर्क स्थापित कर उनके सुखःदुख का भागी बनना पड़ेगा.

अनुसूचित जाति व जनजाति वर्गों के लिए बनी हुई योजनाएँ, उपयोजनाएँ; व कई प्रकार के प्रावधान समय पर तथा ठीक से लागू करना इस बारे में केन्द्र व राज्य शासनों को अधिक तत्परता व संवेदना का परिचय देने की व अधिक पारदर्शिता बरतने की आवश्यकता है ऐसा प्रतीत होता है. अंतर्गत सुरक्षा व्यवस्था का पहला प्रहरी देश का पुलिस बल है. उनकी व्यवस्था के सुधार की अनुशंसा भी ”पुलिस आयोग“ ने की है. अनेक वर्षों से लंबित उस अनुशंसा पर विचार व सुधार के प्रयास की आवश्यकता है.

चिंताजनक प्रवृत्तियाँ

देश को चलानेवाला व्यवस्थातंत्र तथा देश-समाज के द्वारा समाज के दुर्बल घटकों के साथ, उनके उन्नति के प्रयासों में तत्परता, संवेदनशील आत्मीयता तथा पारदर्शिता व आदरसम्मान का व्यवहार बरतने में त्रुटियाँ रह जाने से अभाव, उपेक्षा व अन्याय की मार से जर्जर ऐसे वर्गों के मन में संशय, अलगाव, अविवेक, विद्रोह व द्वेष तथा हिंसा के बीज बोना व पनपाना आसानी से संभव हो जाता है. इसी का लाभ लेकर उनको अपने स्वार्थप्रेरित उद्देश्य के लिए, देशविरोधी कृत्यों के लिए, आपराधिक गतिविधियों के लिए गोला बारूद; के रूप में उपयोग करना चाहने वाली शक्तियाँ उनमें अपने छल-कपट के खेल खेलती है. गत 4 वर्षों में समाज में घटी कुछ अवांछित घटनाएँ, समाज के विभिन्न वर्गों में व्याप्त नई-पुरानी समस्याएँ, विभिन्न नयी-पुरानी माँगें आदि को लेकर आन्दोलनों को एक विशिष्ट रूप देने का जो लगातार प्रयास हुआ, उससे यह बात सभी के ध्यान में आती है. आनेवाले चुनाव के वोटों पर ध्यान रखकर, सामाजिक एकात्मता, कानून संविधान का अनुशासन आदि की नितांत उपेक्षा करके चलने वाली स्वार्थी, सत्तालोलुप राजनीति तो ऐसे हथकण्डों के पीछे स्पष्ट दिखती रही है. परन्तु इस बार इन सब निमित्तों को लेकर समाज में भटकाव का, अलगाव का, हिंसा का, अत्यंत विषाक्त द्वेष का तथा देश विरोधिता तक का भी वातावरण खड़ा करने का प्रयास हो रहा है. भारत तेरे टुकड़े होंगे आदि घोषणाएँ जिन समूहों से उठीं उन समूहों के कुछ प्रमुख चेहरे कहीं-कहीं इन घटनाओं में प्रमुखता से अपने भड़काऊ भाषणों के साथ सामने आये. दृढ़ता से वन प्रदेशों में अथवा अन्य सुदूर क्षेत्रों में दबाये गये हिंसात्मक गतिविधियों के कर्ता-धर्ता व पृष्ठपोषण करने वाले अब शहरी माओवाद (अर्बन नक्सल) के पुरोधा बनकर ऐसे आन्दोलनों में अग्रपंक्ति में दिखाई दिये. पहले छोटे-छोटे अनेक संगठनों के जाल फैलाकर तथा छात्रावास आदि में लगातार संपर्क के माध्यम से एक वैचारिक अनुयायी वर्ग खड़ा किया जाता है. फिर उग्र व हिंसक कार्यवाईयों को छोटे-बड़े आन्दोलनों में घुसाकर, अराजकता का अनुभव देकर, उन अनुयायियों में प्रशासन व कानून का डर तथा नागरिक अनुशासन का डर समाप्त किया जाता है. दूसरी ओर समाज में आपस में व स्थापित व्यवस्था व नेतृत्व के बारे में तिरस्कार व द्वेष उत्पन्न किया जाता है. ऐसी अचानक उग्र रूप लेनेवाली घटनाओं के माध्यम से समाज के सब अंगों में प्रस्थापित सभी विचारों का नेतृत्व, जो समाज व्यवस्था व नागरिक व्यवहार की भद्रता के अनुशासन से कम अधिक मात्रा में ही सही बंधा रहता है, अचानक ध्वस्त किया जाता है. नया अपरिचित, अनियंत्रित, केवल नक्सली नेतृत्व से ही बँधा हुआ अंधानुयायी व खुला पक्षपाती नेतृत्व स्थापित करना, यह इन शहरी माओवादियों की ही नव वामपंथी कार्यपद्धति है. सोशल मीडिया, अन्य माध्यम तथा बुद्धिजीवियों व अन्य संस्थाओं में पहले से तथा बाद तक स्थापित इनके हस्तक ऐसी घटनाओं में, इनसे संबद्ध भ्रमपूर्ण प्रचार अभियान में, बौद्धिक व अन्य सभी प्रकार का समर्थन आदि में, सुरक्षित अंतर पर व तथाकथित कृत्रिम प्रतिष्ठा के कवच में रहकर संलग्न रहते हैं. उनके प्रचार का विषैलापन अधिक प्रभावी करने के लिए उन्हें असत्य तथा जहरीली भड़काऊ भाषा का उपयोग स्वछन्दतापूर्वक करना भी आता है. देश के शत्रुपक्ष से सहायता लेकर स्वदेशद्रोह करना तो अतिरिक्त कौशल्य माना जाता है. सोशळ मीडिया के इनके आशय व कथ्य का उद्गम कहाँ से है यह जाँच-पड़ताल की जाए तो यह बात सामने आती है. जिहादी व अन्य कट्टरपंथी व्यक्तियों की कहीं न कहीं प्रत्यक्ष उपस्थिति भी इन सभी घटनाओं में समान बात है. इसलिए यह सारा घटनाक्रम केवल प्रतिपक्ष की सत्ताप्राप्ति की राजनीति मात्र न रहकर देशी-विदेशी भारतविरोधी ताकतों की सांठगांठ से धूर्ततापूर्वक चलाया गया कोई बड़ा षड्यंत्र है; जिसमें राजनीतिक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति अथवा समूह जाने-अनजाने तथा अभाव व उपेक्षा में पिसने वाला समाज का दुर्बल वर्ग अनजाने व अनचाहे गोलाबारूद के रूप में उपयोग में लाये जाने के लिए खींचा जा रहा है, इस निष्कर्ष पर आना पड़ता है. सारा विषाक्त व विद्वेषी वातावरण बनाकर देश की अंतर्गत सुरक्षा का मुख्य आधार समाज के सामरस्य को ही जर्जर बनाकर ढहा देनेवाला मानसशास्त्रीय युद्ध, जिसको अपनी राजनीति-शास्त्र की परम्परा में ”मंत्रयुद्ध“ कहा गया, उसी की सृष्टि की जा रही है.

इसके निरस्तीकरण के लिए शासन-प्रशासन को सजग होकर, समाज में एक ओर ऐसी घटनाएँ न घट पायें जिनका लाभ उपद्रवी शक्तियाँ ले पावें; तथा दूसरी ओर ऐसी उपद्रवी शक्तियों व व्यक्तियों पर चैकस नजर रखकर वे उपद्रवी कार्यवाई न कर पायें यह करना पड़ेगा. धीरे-धीरे समाज का लेशमात्र भी प्रश्रय न मिलने से यह उपद्रवी तत्त्व पूर्ण शमित हो जायेंगे. प्रशासन को अपने सूचना तंत्र को भी व्यापक व सजग बनना पड़ेगा. जनहित की योजनाओं का तत्पर क्रियान्वयन करते हुए समाज के अंतिम पंक्ति तक उन योजनाओं कोे पहुँचाना पड़ेगा. कानून सुव्यवस्था का पालन करवाने के लिए दक्ष व कुशल होकर काम करना पड़ेगा.

परन्तु इस परिस्थिति का संपूर्ण व अचूक उपाय तभी हो सकता है जब समाज के सभी वर्गों में, बुद्धि व भावना सहित आचरण में, आपस में सद्भावना व अपनेपन का व्यवहार हो. पंथ-सम्प्रदाय, जाति-उपजाति, भाषा, प्रान्त आदि की विविधता को हम एकता की दृष्टि से देखें. वर्गविशेष की समस्या व परिस्थिति को अपना दायित्व मानकर सारा समाज मिल-बैठकर उसका न्याय व सद्भावनापूर्वक हल ढूँढे. इसलिए आपस में निरंतर आत्मीय संवाद हो सके ऐसा वातावरण अपने संपर्क व संबंधों को बढ़ाकर उत्पन्न करें. अपने जीवन व्यवहार में नागरिक अनुशासन व कानून व्यवस्था की मर्यादा का आचरण करें. इस सम्बन्ध में हमारे राजनेताओं सहित समाज के प्रत्येक व्यक्ति को पू. डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर का (25 नवम्बर 1949 का) वह प्रसिद्ध भाषण नित्य स्मरण में रखना चाहिए, जिसमें वे परामर्श देते हैं कि न्याय, समता व स्वातंत्र्य की दिशा में देश का बढ़ना, राजनीतिक व आर्थिक प्रजातंत्र के साथ सामाजिक प्रजातंत्र की ओर बढ़ना, समाज में बंधुभाव के व्यापक प्रसार के बिना संभव नहीं. बिना उसके इन प्रजातांत्रिक मूल्यों की व अपनी स्वतंत्रता की भी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. पारतंत्र्य में हमने अपनी मांगों की आवाज उठाने के लिए जो पद्धतियाँ अपनायीं वे स्वातंत्र्य की स्थिति में छोड़ देनी पड़ेगी. हमें लोकतंत्र के अनुशासन में बैठ सकने वाली पूर्णतः संवैधानिक पद्धतियों का ही अवलम्बन करना पड़ेगा.

भगिनी निवेदिता ने भी नागरिकता की समझदारी को ही स्वतंत्र देश में देशभक्ति की दैनन्दिन जीवन में अभिव्यक्ति माना है.

परिवार में संस्कार आवश्यक

देश की राजनीति, कार्यपालिका, न्यायपालिका, स्थानीय प्रशासन, संगठन, संस्थाएँ, विशेष व्यक्ति व जनता इन सबकी इसके बारे में एक व पक्की सहमति तथा समाज की आत्मीय एकात्मता की भावना ही देश में स्थिरता, विकास व सुरक्षा की गारण्टी है. यह संस्कार नई पीढ़ी को भी शैशवकाल से ही घर में, शिक्षा में तथा समाज के क्रियाकलापों में से प्राप्त होने चाहिए. घर से नई पीढ़ी में मनुष्य के मनुष्यत्व व सच्चारित्र्य की नींवरूप सुसंस्कारों का मिलना आज के समय में बहुत अधिक महत्त्व का हो गया है. समाज के वातावरण तथा शिक्षा के पाठ्यक्रमों में आजकल इन बातों का अभाव सा हो गया है. शिक्षा की नयी नीति प्रत्यक्ष लागू होने की प्रतीक्षा में समय हाथ से निकलता जा रहा है. यद्यपि इन दोनों परिवर्तनों के लिए अनेक व्यक्ति व संगठनों के प्रयास शासकीय व सामाजिक ऐसे दोनों स्तरों पर बढ़ रहे हैं, तथापि हमारे हाथ में सर्वथा हमारा अपना घर व हमारा अपना परिवार तो है ही. उसमें हमारी स्वाभाविक आत्मीयता, पारिवारिक व सामाजिक दायित्वबोध, स्वविवेक का निर्माण आदि संस्कारों को अंकित करनेवाला अनौपचारिक शुचितामय प्रसन्न वातावरण अपने उदाहरण सहित देते रहने का अपना नई पीढ़ी के प्रति दायित्व ठीक से निभा रहे हैं यह सजगता से देखने की आवश्यकता है. बदला हुआ समय, उसमें बढ़ा हुआ प्रसार माध्यमों का व्यापक प्रसार व प्रभाव, नई तकनीकी के माध्यम से व्यक्ति को अधिक आत्मकेन्द्रित बनानेवाले तथा व्यक्ति के विवेकबुद्धि को समझे बिना विश्व की सारी सही-गलत सूचनाओं व ज्ञान को उससे साक्षात् करानेवाले साधन इसमें बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता विश्व में सभी को प्रतीत हो रही है. ऐसे समय में परिवार की स्वपरंपरा के सुसंस्कार मिलते रहे. नई दुनिया में जो भद्र है उसे खुले मन से आत्मसात करते हुए भी अपने मूल्यबोध के आधार पर अभद्र से बचने-बचाने का नीर-क्षीर विवेक, उदाहरण व आत्मीयता से नयी पीढ़ी में भरना ही होगा.

देष में पारिवारिक क्लेष, ऋणग्रस्तता, निकट के ही व्यक्तियों द्वारा बलात्कार-व्यभिचार, आत्महत्यायें तथा जातीय संघर्ष व भेदभाव की घटनाओं के समाचार निष्चित ही पीड़ादायक व चिंताजनक है. इन समस्याओं का समाधान भी अंततोगत्वा स्नेह व आत्मीयपूर्ण पारिवारिक वातावरण एवं सामाजिक सद्भाव निर्माण करने में ही है. इस दृष्टि से समाज के सुधी वर्ग एवं प्रमुख प्रबुद्धजनों सहित संपूर्ण समाज को इस दिषा में कर्तव्यरत होना पड़ेगा.

चिन्तन में समग्रता:

हमारी प्रत्येक कृति, उक्ति व मन से भी व्यक्ति, परिवार, समाज, मानवता व सृष्टि, सभी का सुपोषण हो, यह विशेषकर विविध अंगों में समाज का दिग्दर्शन करने वाले सभी को ध्यान में रखना चाहिए. विश्व में कहीं भी समाज का स्वस्थ व शांतिपूर्ण जीवन केवल विधिव्यवस्था व दंड के भय से न चला है न चल सकता है. समाज के द्वारा कानून का पालन समाज के नीतिबोध का परिणाम है न कि कारण. और समाज का नीतिबोध उसके परंपरागत मूल्यबोध से बनता है. मूल्यों के आधार पर पक्का रहकर ही समयानुकूल आचारधर्म अपनाने के लिए नीतिकल्पना व नियम बदलने चाहिए. समाज के आचरण के कारण बननेवाली प्रकृतिगत काम व अर्थ की प्रवृत्ति, उसको मर्यादित कर, उपयोगी व सुख के साथ संतोष व आनंद देने वाली बनाने का काम करनेवाली नीति, नीतिबंधन के अनुशासन से समाज व परिवार एकात्म होकर चलते रहे यह देखनेवाला विधि तथा इन सबका निर्णायक मूल्यबोध यह सब जहाँ परस्परानुकूल सुसंगति से चलते हैं वहाँ वास्तविक व संपूर्ण न्याय होता है. समग्रतापूर्वक विचार तथा धैर्यपूर्वक मन बनाये बिना निर्णयों का समाज के आचरण में स्वीकार तथा उससे देशकाल परिस्थितिनुरुप समाज की नवरचना का निर्माण नहीं होगा. हाल ही में दिये गये शबरीमलै देवस्थान के सम्बंध में निर्णय से उत्पन्न स्थिति भी यही दर्शाति है. सैकड़ों वर्षों से चलती आयी परम्परा, जो समाज में अपनी स्वीकार्यता बना चुकी है, उसके स्वरूप व कारणों के मूल का विचार नहीं किया गया. धार्मिक परम्पराओं के प्रमुख कर्ताधर्ताओं का पक्ष, करोड़ों भक्तों की श्रद्धा को परामर्श में नहीं लिया. महिलाओं में भी बहुत बड़ा वर्ग जो इन नियमों को मानकर चलता है, उनकी बात नहीं सुनी गयी. कानूनी निर्णय से समाज में शांति, सुस्थिरता व समानता के स्थान पर अशांति, अस्थिरता व भेदों का सृजन हुआ. क्यों, हिन्दू समाज की श्रद्धाओं पर ही ऐसे आघात लगातार व बिना संकोच किये जाते हैं, ऐसे प्रष्न समाज मन में उठते हैं व असंतोष की स्थिति बनती चली जाती है. यह स्थिति समाज जीवन की स्वस्थता व शांति के लिये कतई ठीक नहीं है.

स्वतंत्र देश का ”स्व“ आधारित तंत्र

भारत के जीवन के सभी अंगों के नवनिर्माण में भारत के मूल्यबोध के शाश्वत आधार पर पक्का रहकर ही प्रगति करनी पड़ेगी. अपने देश में जो है उसको देश-काल-परिस्थिति-अनुरुप सुधार कर, परिवर्तित कर अथवा आवश्यक है तो कुछ बातों को पूर्णतः त्यागकर भी युगानुकूल बनाना तथा विश्व में जो भद्र है, अच्छा है उसको देशानुकूल बनाना इन दोनों के निर्णय का आधार यही मूल्यबोध है. यही अपने देश का प्रकृतिस्वभाव है. यही हिन्दुत्व है. अपने प्रकृतिस्वभाव पर पक्का व स्थिर रहकर ही कोई देश उन्नत होता है. अंधानुकरण से नहीं.

शासन की अच्छी नीतियों के परिणाम समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक अनुभव में आएं, इसलिए प्रशासन के द्वारा उनकी तत्परता, संवेदनशीलता, पारदर्शिता व संपूर्णता के साथ जो कार्यवाही होनी चाहिए, उस प्रमाण में अभी भी नहीं हो रही है. अंग्रेजों का परकीय राज्य व प्रशासन हमारे भूमि व राज्यों पर केवल सत्ता चलाने का काम करता था. अब स्वतंत्र भारत में हमारे अपने शासक हमारे अपने प्रशासन को प्रजापालक प्रशासन बनाएँ यह अपेक्षा है.

केवल राजनैतिक स्वतंत्रता अपने आप में पूर्ण नहीं होती. राष्ट्र के जीवन व्यवहार के सभी पहलुओं की पुनर्रचना उसी ‘स्व’ तथा स्वगौरव के आधार पर खड़ी करनी पड़ती है, जिनसे हमें स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए एक जन के नाते प्राणवान बनाकर प्रेरित किया. स्वतंत्र भारत की जनाकांक्षा हमारे संविधान की प्रस्तावना, मूल अधिकार, मार्गदर्शकतत्त्व, व मूलभूत कर्तव्य इन चारों प्रकरणों में परिभाषित हैं. उनके प्रकाश में हमें राष्ट्र के जीवन व्यवहार की, राष्ट्र के विकास की लक्ष्यदृष्टि, दिशा व तद्नुरूप जीवन के अर्थायाम सहित सभी अंगों के विकास का अपना विशिष्ट भारतीय प्रतिमान खड़ा करना पड़ेगा. तब हमारे सारे प्रयास, नीतियाँ पूर्णतः क्रियान्वित व प्रतिफलित होती दिखेंगी.

विश्वभर की अच्छी बातें लेकर भी हम अपने तत्त्वदृष्टि के नींव पर अपना विशिष्ट विकास प्रतिमान व तद्नुरुप व्यवस्था खड़ी करें यह अपने देष के विकास की अनिवार्य आवश्यकता है.

श्रीराम जन्मभूमि

राष्ट्र के ‘स्व’ के गौरव के ही संदर्भ में अपने करोड़ों देशवासियों के साथ श्रीराम जन्मभूमि पर राष्ट्र के प्राणस्वरूप धर्ममर्यादा के विग्रहरूप श्रीरामचन्द्र का भव्य राममंदिर बनाने के प्रयास में संघ सहयोगी है. सब प्रकार के साक्ष्य वहाँ कभी मंदिर था, यह बता रहे हैं; फिर भी मंदिर निर्माण के लिए जन्मभूमि का स्थान उपलब्ध होना बाकी है. न्यायिक प्रक्रिया में तरह-तरह की नई बातें उपस्थित कर निर्णय न होने देने का स्पष्ट खेल कतिपय शक्तियों द्वारा चल रहा है. समाज के धैर्य की बिनाकारण परीक्षा यह किसी के हित में नहीं है. मंदिर का बनना स्वगौरव की दृष्टि से आवश्यक है ही, मंदिर बनने से देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनना प्रारम्भ होगा. देशहित की इस बात में कुछ कट्टरपंथी व सांप्रदायिक राजनीति को उभारकर अपना स्वार्थसाधन करनेवाली शक्तियाँ बाधाएँ खड़ी कर रही हैं. ऐसे छलकपट के बावजूद शीघ्रतापूर्वक उस भूमि के स्वामित्व के संबंध में निर्णय हो तथा शासन के द्वारा उचित व आवष्यक कानून बनाकर भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रषस्त किया जाना चाहिये.

निर्वाचन

देश का नेतृत्व कौन करें? जो नीतियाँ चली हैं वह सही हैं अथवा गलत? इन सब बातों का निर्णय प्रजातंत्र की अपने देश की व्यवस्था में पाँच वर्षों में एक बार सामान्य मतदाता करें, यह कर्तव्य उसी का माना जाता है. वह पंचवर्षीय निर्वाचन अपने सामने है. एक प्रकार से इस अधिकार से हम भारत के लोग, सामान्य जनता ही भारत की परिस्थिति का निर्णय व नियंत्रण करनेवाले हो जाते हैं. परन्तु हम यह भी जानते हैं कि उस एक दिन के मतदान से हम जो निर्णय करते हैं, उसके अच्छे-बुरे तात्कालिक परिणाम भोगना; व दीर्घकालीन नफा-नुकसान को झेलने का काम आगे बहुत वर्षों तक अथवा जीवनभर करते रहना; बस! उस एक दिन के पश्चात् हमारे हाथ में इस से अधिक कुछ नहीं रह जाता. पछताना न पड़े ऐसा निर्णय मतदाताओं के द्वारा प्राप्त होना है तो, मतदाताओं को राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर; स्वार्थ, संकुचित भावनाएँ व अपने भाषा, प्रान्त, जाति आदि छोटे दायरों के अभिनिवेश से ऊपर उठकर विचार करना पड़ेगा. उम्मीदवार की प्रामाणिकता व क्षमता, दल के नीति की राष्ट्रहित व राष्ट्र की एकात्मता के साथ प्रतिबद्धता तथा इन दोनों के पहले के तथा वर्तमान के क्रियाकलापों के अनुभव; इनका स्वतंत्र बुद्धि से मतदाताओं को विचार करना पड़ेगा.

प्रजातंत्र की राजनीति का चरित्र ऐसा रहता आया है कि संपूर्णतया योग्य अथवा संपूर्णतया अयोग्य किसी को नहीं मान सकते. ऐसी स्थिति में मतदान न करना अथवा छव्ज्. के अधिकार का उपयोग करना, मतदाता की दृष्टि में जो सबसे अयोग्य है उसी के पक्ष में जाता है. इसलिए सभी तरफ के प्रचार को सुनकर, उसके जाल में न फंसते हुए राष्ट्रहित सर्वोपरि रखकर 100 प्रतिशत मतदान आवश्यक है. भारत का चुनाव आयोग भी इसी प्रकार से 100 प्रतिशत मतदान व विचारपूर्वक मतदान का आग्रह करता है. इस नागरिक कर्तव्य की अनुपालना संघ के स्वयंसेवक भी करते आये हैं; व सदा की भाँति इस बार भी करेंगे.

दलगत राजनीति, जातिसम्प्रदायों के प्रभाव की राजनीति आदि से संघ अपने जन्म से सोच-समझकर अलग रहता आया है, रहेगा. परन्तु सम्पूर्ण देश में व्याप्त स्वयंसेवकों की संख्या नागरिक के नाते अपने कर्तव्यों को पूर्ण करे तथा समग्र व सम्यक् राष्ट्रहित के पक्ष में अपनी शक्ति को खड़ा करे, यह देशहित के लिए आवश्यक कार्य है.

आवाहन

देशहित की मूलभूत अनिवार्य आवश्यकता है कि भारत के ‘स्व’ की पहचान के सुस्पष्ट अधिष्ठान पर खड़ा हुआ सामथ्र्यसंपन्न व गुणवत्तावाला संगठित समाज इस देश में बने. वह हमारी पहचान हिन्दू पहचान है जो हमें सबका आदर, सबका स्वीकार, सबका मेलमिलाप व सबका भला करना सिखाती है. इसलिए संघ हिन्दू समाज को संगठित व अजेय सामथ्र्यसंपन्न बनाना चाहता है और इस कार्य को सम्पूर्ण संपन्न करके रहेगा. अपने-अपने सम्प्रदाय, परंपरा व रहन-सहन को लेकर अपने आप को अलग माननेवाले अथवा ”हिन्दू“ शब्द से भयभीत होनेवाले समाज के वर्गों को यह समझने की आवश्यकता है कि हिन्दुत्व तो इस देश के सनातन मूल्यबोध को ही कहते हैं. उसके इस सत्य व शाश्वत अंतरंग को कायम रखकर ही उसमें देश-काल-परिस्थति-अनुरुप स्वरूप व व्यवहार के परिवर्तन आये हैं व आगे भी आवश्यकतानुरूप हो सकते है. हिमालय से समुद्रपर्यन्त अखंड भारतभूमि के साथ हिन्दुत्व का तादात्म्य है. उस मूल्यबोध से अनुप्राणित भारत की एक संस्कृति के रंग में सभी भारतीय रंग लें, यह संघ की इच्छा हैं. भारत के सभी पंथ-सम्प्रदायों का आचार धर्म उसी को आधार बनाकर चलता है. इस हिन्दू संस्कृति व समाज की सुरक्षा तथा संवर्धना के लिए प्रखर परिश्रम करनेवाले, प्राणोत्सर्ग करनेवाले महापुरुष हम सबके पूर्वज, हम सबके गौरव हैं. संपूर्ण विश्व को, उसकी विशिष्ट विविधताओं का स्वागत व स्वीकार करते हुए हृदय से अपनाने की क्षमता भारत में इस हिन्दुत्व के कारण है. इसलिए भारत हिन्दुराष्ट्र है. संगठित हिन्दू समाज ही देश की अखण्डता, एकात्मता व निरन्तर उन्नति का आधार है. सारी दुनिया में कट्टरपन, संकुचित स्वार्थ व आत्यंतिक जड़वादिता के कारण मर्यादारहित उपभोग वृत्ति तथा संवेदनहीनता को समाप्त करने का एकमात्र उपाय हिन्दुत्व के शाश्वत मूल्यबोध का स्वीकार यही है. हिन्दू संगठन का कार्य इसीलिए विश्वहितैषी, भारतकल्याणकारी एवं लोकमंगल का कार्य है.

आप सबको आवाहन है कि संघ के स्वयंसेवकों के साथ इस पवित्र ईश्वरीय कार्य में सहयोगी व सहभागी बनते हुए हम सब मिलकर भारतमाता को विश्वगुरु पद पर स्थापन करने के लिए भारत के भाग्यरथ को अग्रसर करें.

नहीं है अब समय कोई, गहन निद्रा में सोने का,
समय है एक होने का, न मतभेदों में खोने का.
बढ़े बल राष्ट्र का जिससे, वो करना मेल है अपना,
स्वयं अब जागकर हमको, जगाना देश है अपना..

.. भारत माता की जय..

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here